भोपाल की सांस्कृतिक विरासत बचाने की पहल, सभी धर्मों के बुद्धिजीवियों ने उठाई आवाज
- राजधानी की ऐतिहासिक धरोहरें सरकार की उपेक्षा और अतिक्रमण की शिकार: पूर्व डीजीपी अंसारी
✍️नौशाद कुरैशी
भोपाल। भारत की खूबसूरत और शांतिपूर्ण राजधानी भोपाल, जिसे झीलों की नगरी के साथ-साथ साहित्य और सांस्कृतिक धरोहरों के लिए जाना जाता है, अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए एकजुट हो रहा है। 'विरासते भोपाल मंच' द्वारा हाल ही में एक विशेष बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें शहर के प्रमुख बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, इतिहासकार, सांस्कृतिक हस्तियां, और राजनीतिक नेता शामिल हुए। इस बैठक का उद्देश्य इकबाल मैदान और अन्य ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और पुनरुद्धार पर ध्यान केंद्रित करना था।
भोपाल की सांस्कृतिक पहचान और इकबाल मैदान का महत्व
भोपाल की ऐतिहासिक पहचान में शायर-ए-मशरिक डॉ. अल्लामा इकबाल का नाम गर्व से लिया जाता है। उनके नाम पर स्थित इकबाल मैदान, एक समय सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्रमों का केंद्र था। यह स्थान गंगा-जमनी तहज़ीब और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जाता था। अल्लामा इकबाल, जिन्होंने "सारे जहाँ से अच्छा" जैसे राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत गीत लिखे और भगवान राम को 'इमाम-ए-हिंद' की उपाधि दी, भारतीय साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक अद्वितीय स्थान रखते हैं।
लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में इकबाल मैदान पर प्रतिबंध लगाने और अन्य ऐतिहासिक स्थलों की उपेक्षा ने नागरिकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। बैठक में इन मुद्दों पर गहन चर्चा हुई और सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों पर लगे प्रतिबंध को हटाने की मांग की गई।
बैठक में उठाए गए मुख्य मुद्दे
पूर्व डीजीपी एम.डब्ल्यू. अंसारी ने कहा कि भोपाल की ऐतिहासिक धरोहरें सरकार की उपेक्षा और अतिक्रमण की शिकार हो रही हैं। सदियों पुरानी मस्जिदें, मकबरे और दरगाहें अब वीरान पड़ी हैं। ऐसे काम किए जाएं जिससे समाज का भला हो, हर नागरिक शिक्षित हो और बेरोजगारों को रोजगार मिले।
नाम बदलने की राजनीति: इलाहाबाद से प्रयागराज, होशंगाबाद से नर्मदापुरम और भोपाल के हबीबगंज स्टेशन का नाम रानी कमलापति स्टेशन करना, इस्लामनगर का नाम जगदीशपुर करना जैसे फैसले चर्चा का विषय रहे।
धरोहरों की उपेक्षा: ताज-उल-मसाजिद, सदर मंजिल, गोलघर और अन्य ऐतिहासिक स्थानों के संरक्षण की मांग की गई।
प्रमुख मांगे और सुझाव
1. इकबाल मैदान का पुनरुद्धार: इस स्थान को फिर से सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का केंद्र बनाया जाए।
2. शिक्षा और रोजगार पर जोर: भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाए और ख्वाजा गरीब नवाज के नाम पर उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए।
3. सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण: प्रशासन को प्राथमिकता के आधार पर इन स्थलों की देखभाल और सौंदर्यीकरण सुनिश्चित करना चाहिए।
गंगा-जमनी तहज़ीब की मिसाल
बैठक में सभी धर्मों और समाजों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए एक स्वर में अपनी प्रतिबद्धता जताई। प्रमुख प्रतिभागियों में एडवोकेट साजिद अली, नवाब शादाब अली बहादुर, सरदार रणवीर सिंह वज़ीर, अली अब्बास उम्मीद, शैलेंद्र शैली, शोएब शाद, मोहसिन अली खान, दिनेश जैन, शायर इकबाल मसूद, सरवत जै़दी, राज कुमार वर्मा, पुरुषोत्तम गुप्ता, मुहम्मद हुसैन, वरिष्ठ नेता दीप चंद यादव, मुहम्मद ज़हीर, सामाजिक कार्यकर्ता मुनव्वर अली खान, इनाम हुसैन नवेद, अभिषेक वर्मा और अन्य गणमान्य लोग शामिल थे।
विरासत को बचाने उठाए ठोस कदम
भोपाल के नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह पहल न केवल सांस्कृतिक विरासत को बचाने का प्रयास है, बल्कि यह गंगा-जमनी सभ्यता और आपसी भाईचारे का प्रतीक भी है। सरकार से अपेक्षा है कि वह इन सुझावों पर गंभीरता से विचार करे और भोपाल की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए।
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