पुण्यतिथि पर विशेष : उर्दू भाषा के सच्चे सेवक और समाजसेवा के अनमोल प्रेरणा स्रोत एम. ताहिर

यादों के झरोखों से:  भोपाल के इकबाल मैदान में आयोजित ईद और होली मिलन समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से गुफ्तगू करते हुए एम. ताहिर।

✍️नौशाद कुरैशी 

दुनिया में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपनी पूरी जवानी केवल सेवा में समर्पित कर देते हैं और इसके बदले में किसी प्रकार का लाभ, नाम या प्रसिद्धि की कामना नहीं करते। ऐसे ही व्यक्तियों में से एक नाम जनाब एम. ताहिर का है। जनाब एम. ताहिर न केवल एक नेकदिल, विनम्र और उदार व्यक्ति थे, बल्कि उर्दू भाषा से भी गहरा लगाव रखते थे।

जनाब एम. ताहिर साहब का जन्म भोपाल में अगस्त 1935 में हुआ और 30 दिसंबर 2006 को वह इस दुनिया से रुख़सत हो गए। अपने इस छोटे से जीवनकाल में उन्होंने जो सेवाएँ प्रदान कीं, उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। वह हर साल 12 अक्टूबर से लेकर अक्टूबर के अंत तक "उर्दू सप्ताह" मनाते थे, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोग, उर्दू प्रेमी और कई नेता भी हिस्सा लेते थे। इस आयोजन का उद्देश्य उर्दू साहित्य और भाषा का प्रचार-प्रसार करना था।

ताहिर साहब जमीयत उलेमा-ए-हिंद, भोपाल के महासचिव के पद पर भी कार्यरत रहे और मुस्लिम त्योहार कमेटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई। 1990 के दशक में उन्होंने मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के गठन के साथ-साथ कई अन्य संगठनों से भी जुड़ाव रखा। उन्होंने मुस्लिम त्योहार कमेटी के अंतर्गत सिरत-ए-नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जलसों का आयोजन किया और कई अन्य सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर सक्रियता से काम किया।

जनाब एम. ताहिर साहब ने 1979 में एक फिक्र-ओ-मज़ाहिया मुशायरे का भी आयोजन किया था। वह भोपाल के मशहूर लेखक फिकर-ओ-मज़ाहिया नवीस के दामाद थे। सिरत-ए-तैयबा के जलसे आयोजित करना उनकी विशेषता थी।

एम. ताहिर साहब एक बेहद दयालु और उदार व्यक्तित्व के मालिक थे। वह दोस्तों और प्रियजनों की अक्सर मदद किया करते थे और हर प्रकार के कार्यक्रम में दिल खोलकर खर्च करते थे। उर्दू भाषा के प्रेम के कारण उन्होंने अपने घर में एक स्कूल भी खोला था। यह स्कूल लगभग दो साल तक चला, जिसमें मुस्लिम बच्चों को कम फीस पर शिक्षा दी जाती थी। बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए वह कई बार कार्यक्रम आयोजित करते और उन्हें पुरस्कार बाँटते थे।

30 दिसंबर को उनकी 17वीं बरसी के अवसर पर उनके बेटे मोहम्मद रिज़वान शानू और उनके परिवार ने अपने घर पर क़ुरआन-ख़्वानी कराकर उन्हें श्रद्धांजलि दी और मुस्लिम समुदाय से उनके लिए मग़फिरत की दुआ की अपील की।

जनाब एम. ताहिर साहब का यह योगदान और उनकी सेवाएँ हमेशा याद की जाएँगी। आज उनकी 17वीं बरसी (पुण्यतिथि) पर खिराज-ए-अकीदत(श्रद्धांजलि) पेश है। किसी शायर ने कहा है -                                                                  

"दिल ना उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है। 

लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है।।" 



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