मध्यप्रदेश की पुरातत्वीय धरोहर पर वेबिनार: इतिहास और महत्व पर विशेषज्ञों की विशेष चर्चा


✍️सप्तग्रह रिपोर्टर 

भोपाल। मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों पर मौजूद पुरातात्विक महत्व की मूर्तियां और धरोहरें इतिहास और संस्कृति का अमूल्य खजाना हैं। इनकी विरासत को जन-जन तक पहुंचाने और इनके महत्व को रेखांकित करने के उद्देश्य से संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय ने "मास्टर पीसेस ऑफ एमपी" विषय पर एक विशेष वेबिनार का आयोजन किया।

कार्यक्रम की शुरुआत संचालनालय की आयुक्त श्रीमती उर्मिला शुक्ला के स्वागत उद्बोधन से हुई। उन्होंने वेबिनार के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए विशेषज्ञ वक्ताओं का परिचय कराया और उन्हें अपने विचार साझा करने के लिए आमंत्रित किया।

इस वेबिनार में डेक्कन कॉलेज ऑफ आर्कियोलॉजी, पुणे के डॉ. गोपाल जोगे, पुरातत्व विभाग के पूर्व अधीक्षक डॉ. मैनुएल जोसेफ, और वरिष्ठ पुरातत्वीय अधिकारी डॉ. रमेश यादव वक्ता के रूप में उपस्थित थे। उन्होंने मध्यप्रदेश की विशिष्ट धरोहरों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की।

विशिष्ट धरोहरों पर चर्चा

वेबिनार के दौरान वक्ताओं ने प्रदेश की कई प्रसिद्ध विरासतों की विशिष्टताओं को उजागर किया। इनमें शहडोल म्यूजियम की नरसिंह प्रतिमा, स्टेट म्यूजियम की हरिहर कृति और देव बड़ला के मंदिर प्रमुख थे। वक्ताओं ने इन धरोहरों के पुरातात्विक महत्व, इनसे जुड़े इतिहास और कला के विशेष पहलुओं को रेखांकित किया।

प्रतिभागियों की जिज्ञासा का समाधान

कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लगभग 80 प्रतिभागियों ने भाग लिया। वक्ताओं के उद्बोधन के बाद प्रतिभागियों ने अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया। विशेषज्ञों ने इन सवालों के जवाब देकर प्रतिभागियों को संतुष्ट किया और उन्हें पुरातत्व के विभिन्न पहलुओं की गहरी जानकारी दी।

संस्कृति के संरक्षण की दिशा में पहल

इस वेबिनार के माध्यम से न केवल पुरातात्विक धरोहरों की महत्ता को समझने का अवसर मिला, बल्कि इनकी जानकारी को जनसामान्य तक पहुंचाने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। यह पहल प्रदेश की धरोहरों को संरक्षित और प्रचारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

बता दें कि संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय के इस प्रयास की प्रतिभागियों ने सराहना की और इसे इतिहास और संस्कृति को जोड़ने का एक उत्कृष्ट माध्यम बताया। इस तरह के आयोजनों से प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों को नई पहचान मिलने के साथ-साथ युवा पीढ़ी को भी अपने अतीत से जुड़ने का अवसर मिलता है।



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