मौन नहीं मुखर मोहन: तीखे सवालों के बेबाक जवाब..!
- जब शांत नेतृत्व ने इतिहास बदलने वाले फैसले लिए
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होेंने दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। डॉ. सिंह 2004 से 2014 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे और उन्हें देश की आर्थिक नीतियों में सुधार के लिए जाना जाता है। उनके निधन पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित कई प्रमुख नेताओं ने शोक व्यक्त किया है।
श्रद्धांजलि:✍️नौशाद कुरैशी
डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल उनकी शांत प्रवृत्ति और दृढ़ नीतियों के लिए जाना जाता है। प्रधानमंत्री रहते हुए उन्हें "मौन मोहन" कहकर कटाक्ष किया गया, लेकिन वे कभी सवालों से बचते नहीं थे। नेशनल मीडिया सेंटर में अपनी अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, भ्रष्टाचार से जुड़े तीखे सवालों का भी उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। उनके व्यक्तित्व की खासियत थी कि वे हमेशा शांत रहते थे, लेकिन जब बड़े फैसलों का वक्त आता, तो उनका मौन मुखर हो जाता था।
2006 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौता एक ऐसा ही कठिन निर्णय था। यूपीए-1 सरकार के दौरान इस फैसले से पूरी सरकार दांव पर लग गई थी। वामदलों द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी के बावजूद, मनमोहन सिंह ने अपना कदम पीछे नहीं खींचा और समझौते पर हस्ताक्षर किए।
डॉ. सिंह ने सुधारों को लेकर कभी समझौता नहीं किया। मंत्रिमंडल में मतभेद होने पर भी उन्होंने सख्त फैसले लिए। एक बार, वरिष्ठ सहयोगी अर्जुन सिंह द्वारा शैक्षिक संस्थानों पर लिए गए विवादास्पद निर्णयों को उन्होंने पत्र लिखकर रोकने का आदेश दिया। वे कभी आक्रामक नहीं हुए, लेकिन सुधारों को लागू करने में वे पूरी तरह अडिग रहते थे। जहां जरूरी समझा, वहां उन्होंने अपनी राय स्पष्ट रखी।
1991 में नरसिंहराव सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए, डॉ. सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव लाने वाले सुधारों की नींव रखी। 24 जुलाई 1991 को पेश किया गया बजट भारत की आर्थिक आजादी का प्रतीक बन गया। लाइसेंस-परमिट राज को समाप्त करने वाले निर्णयों ने देश की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी। उनकी नीतियों में एक बड़े अर्थशास्त्री का विजन झलकता था, जिसने देश में सकारात्मक बदलाव लाए।
मनमोहन सिंह सादगी और संवेदनशीलता के लिए भी प्रसिद्ध थे। राजनीति के दांव-पेंच से दूर रहते हुए, उन्होंने मनरेगा, शिक्षा का अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे फैसलों से गरीबों और वंचितों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। देश और विदेश में सम्मानित डॉ. सिंह के योगदान को उनके विरोधी भी आदरपूर्वक याद करते रहेंगे।
सादगी ज़िंदगी जीने का एक ऐसा तरीका है, जिसमें इंसान अपनी जिंदगी को स्वाभाविक और सहज बनाए रखता है। यह रवैया ग़ैर-ज़रूरी सुविधाओं, चमक-दमक और दिखावे से दूर रहकर वास्तविक और सरल जीवन को अपनाने पर जोर देता है। सादगी न केवल इंसान को मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि उसे फिजूलखर्ची और अनावश्यक जटिलताओं से भी बचाती है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. सिंह का यह रवैया एक संतुलित और सकारात्मक जीवन जीने का तरीका सिखाता है। मिर्ज़ा ग़ालिब की जयंती पर उन्ही के इस प्रसिद्ध शेर के माध्यम से पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. सिंह को सादर श्रद्धांजलि अर्पित है-
"इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं "
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