गणतंत्र दिवस: परवाज़ की नई हदें और मुहब्बत का पैग़ाम


विशेष संपादकीय:✍️ नौशाद कुरैशी 

णतंत्र दिवस (यौमे-ए-जम्हूरियत) केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जब भारत ने दुनिया के सामने अपनी लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक पहचान को स्थापित किया। 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ, और यह दिन हर भारतीय के लिए गर्व और आत्मविश्लेषण का अवसर बन गया।

ऊंचाई की ओर परवाज़

"हम कहां रुकते हैं अर्शो फर्श की आवाज़ से,

हमको जाना है बहुत ऊंचा हद-ए-परवाज़ से।"

इन पंक्तियों में छिपा संदेश हमें बताता है कि भारत की यात्रा केवल आज़ादी हासिल करने तक सीमित नहीं थी। असली परवाज़ तो तब शुरू हुई, जब हमने अपने लक्ष्यों को ऊंचा किया। आज भारत विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अनुसंधान, शिक्षा, और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नई ऊंचाइयों को छू रहा है। हमारे संविधान ने हमें यह क्षमता और आत्मविश्वास दिया कि हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं।

अहले सियासत और आम नागरिक की भूमिका

"उनका जो काम है वह अहले सियासत जाने,

अपना पैग़ाम है मुहब्बत जहां तक पहुंचे।"

इन पंक्तियों में एक महत्वपूर्ण संदेश है कि देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल सियासतदानों पर नहीं है। हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने हिस्से का योगदान दे। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी शक्ति हमारी एकता में है। जाति, धर्म, भाषा, और भौगोलिक सीमाओं से परे, हमें 'हम भारत के लोग' के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा।

मुहब्बत का पैग़ाम

गणतंत्र दिवस न केवल संविधान के प्रति सम्मान प्रकट करने का अवसर है, बल्कि यह उन मूल्यों की पुनः स्थापना का भी दिन है, जिन पर यह देश खड़ा है। समानता, स्वतंत्रता, और बंधुत्व का भाव केवल किताबों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बनना चाहिए।

हमारी परवाज़ तभी सार्थक होगी जब हम 'मुहब्बत का पैग़ाम' हर कोने में पहुंचाएंगे। यह मुहब्बत केवल व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस भावना का प्रतीक है जो समाज को जोड़ती है। गरीबों, पिछड़ों, और वंचितों को मुख्यधारा में लाना, उनके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना, और समाज में सामंजस्य बनाए रखना ही इस पैग़ाम की असली ताकत है।

नए भारत की ओर

आज का भारत विश्व पटल पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। हमने गणतंत्र की इस यात्रा में कई चुनौतियों का सामना किया और उनसे सीखते हुए आगे बढ़े। लेकिन यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। हमें पर्यावरण, गरीबी, बेरोज़गारी और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों का समाधान खोजना है।

आत्ममंथन का दिन 

गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है, यह आत्ममंथन का दिन है। आइए, इस अवसर पर संकल्प लें कि हम एक ऐसा भारत बनाएंगे जो अपने संविधान की भावना के अनुरूप हो।

"हम कहां रुकते हैं" यह भावना हमें याद दिलाती है कि हमारे सपनों की उड़ान अभी बाकी है। गणतंत्र दिवस हमें प्रेरणा देता है कि हम इस उड़ान को जारी रखें, न केवल खुद के लिए बल्कि पूरे विश्व को प्रेरित करने के लिए। आइए, इस दिन को अपनी जिम्मेदारियों की याद दिलाने और अपनी एकजुटता के उत्सव के रूप में मनाएं। जय हिंद... जय भारत... 




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