उर्दू शायरी दिलों को जोड़ने और देशप्रेम को अभिव्यक्त करने का सशक्त जरिया: डॉ. नुसरत मेहदी


  • मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा "जश्न-ए-जम्हूरियत" मुशायरे का भव्य आयोजन 

भोपाल । मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग द्वारा गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में "जश्न-ए-जम्हूरियत" मुशायरे का भव्य आयोजन किया गया। यह गरिमामय साहित्यिक संध्या भोपाल के राज्य संग्रहालय सभागार, श्यामला हिल्स में संपन्न हुई, जिसमें देशभर के प्रख्यात शायरों ने अपने जज़्बाती और प्रेरणादायक अशआर पेश कर देशभक्ति व लोकतंत्र की भावना को बुलंद किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि "जश्न-ए-जम्हूरियत" मुशायरे का उद्देश्य देशभक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना एवं उन्हें आत्मसात करना है। देशभक्ति केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है, जिसे हर नागरिक को अपने विचारों और कर्मों के माध्यम से जीवंत रखना चाहिए। उर्दू शायरी ऐसे जज़्बातों को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है, जो दिलों को जोड़ती है और राष्ट्रीय एकता को मजबूती प्रदान करती है।"


ख्याति प्राप्त शायरों ने किया देशभक्ति का अलख जगाने वाला काव्यपाठ

मुशायरे की अध्यक्षता जाने-माने शायर एवं साहित्यकार प्रो. शहपर रसूल ने की। कार्यक्रम में देशभर से आए प्रसिद्ध शायरों ने अपने अनूठे कलाम पेश किए, जिनमें देशप्रेम, इंसानियत और समाज की बेहतरी के संदेश निहित थे।

प्रो. शहपर रसूल ने अपने कलाम में कहा—

"न शायरी की हवस है न फ़िक्रे शोहरत-ओ-नाम,

सो हमने सोचा बहुत है मगर कहा कम है।"

डॉ. अंजुम बाराबंकवी ने देशप्रेम के जज़्बे को इन पंक्तियों में व्यक्त किया—

"मेरे सर का ताज है हिन्दोस्तान,

फ़ख़्र है अंजुम यहाँ की धूल पर।"

हिना रिज़वी हैदर ने इश्क़ और इंसानी जज़्बात को कुछ इस तरह पेश किया—

"इश्क़ नादानों का है खेल, हमीं कहते थे,

और फिर हमने ही इक रोज़ ये नादानी की।"


क़ाज़ी मलिक नवेद ने अपनी शायरी में हौसले और बुलंदी की बात की—

"झुक झुक के सलामी दे मग़रूर समन्दर भी,

दरिया भी क़दम चूमे, क़तरा हो तो ऐसा हो।"

नफ़ीसा सुल्ताना अना ने मातृभूमि के प्रति अपने जज़्बात को इस तरह व्यक्त किया—

"मख़्मूर हवाएँ हैं फ़क़त मेरे वतन की,

लब पर भी दुआएँ हैं फ़क़त मेरे वतन की।"

आशु मिश्रा ने रिश्तों की अहमियत और एहसान-फ़रामोशी पर लिखा—

"सूखते पेड़ से पंछी का जुदा हो जाना,

ख़ुद-परस्ती नहीं एहसान-फ़रामोशी है।"

चराग़ शर्मा ने अपनी भावनाओं को इस रूप में प्रस्तुत किया—

"नज़रें मिलीं तो बात नहीं कर‌ सकूँगा मैं,

दो काम एक साथ नहीं कर सकूँगा मैं।"

शादाब आज़मी ने संघर्ष और सफलता का जज़्बा इन शब्दों में पिरोया—

"ये दुनिया है, यहाँ बैठे-बिठाए कुछ नहीं होता,

जो तूफ़ानों से लड़ता है, उसी का नाम होता है।"

ग़ौसिया ख़ान सबीन ने देश और इबादत को जोड़ते हुए लिखा—

"लब पर ख़ुदा का नाम हो, दिल में वतन का दर्द,

निकले बदन से रूह मेरी इस अदा के साथ।"

संदीप श्रीवास्तव ने नई पीढ़ी की सोच और संकल्प को इन पंक्तियों में व्यक्त किया—

"हम ऐसी नस्ल के पौधे जो सब्ज़ रहने को,

शजर बने न बने, फल बनाने लगते हैं।"

मुशायरे का प्रभावशाली संचालन

कार्यक्रम का संचालन उर्दू साहित्य के जाने-माने कवि चराग़ शर्मा ने किया, जिन्होंने अपनी ओजस्वी शैली से मुशायरे को शानदार अंदाज में आगे बढ़ाया।

समापन और आभार प्रदर्शन

कार्यक्रम के अंत में डॉ. नुसरत मेहदी ने सभी शायरों, अतिथियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उर्दू साहित्य और शायरी हमेशा से देश की संस्कृति का अभिन्न अंग रही है, और इस तरह के मुशायरे राष्ट्रीय एकता व सौहार्द को मजबूत करने का कार्य करते हैं।

इस अवसर पर भोपाल एवं अन्य स्थानों से आए श्रोताओं ने बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ शायरी का आनंद लिया और अपने चहेते शायरों को भरपूर सराहा। "जश्न-ए-जम्हूरियत" मुशायरा न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए एक यादगार शाम साबित हुआ, बल्कि यह गणतंत्र दिवस की भावना को और अधिक प्रगाढ़ करने का एक सफल प्रयास भी रहा।



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