शब-ए-बारात: इबादत और मगफिरत की मुबारक रात
✍️नौशाद कुरैशी
मुस्लिम कैलेंडर के अनुसार शाबान माह की 14 तारीख की रात (गुरुवार, 13 फरवरी) को शब-ए-बारात मनाया जा रहा है। यह रात इबादत, तिलावत और सखावत (दान-पुण्य) से सजी होती है, जिसमें मुसलमान अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं और अपनी तक़दीर की बेहतरी के लिए दुआ करते हैं।
इस मुबारक रात को मस्जिदों और कब्रिस्तानों में विशेष सजावट की जाती है। कब्रिस्तानों में भीड़ उमड़ती है, जहां लोग अपने मरहूम रिश्तेदारों के लिए मगफिरत की दुआ करते हैं। यह रात आत्मा की शुद्धि, बीते कर्मों के लेखा-जोखा और आने वाले साल की तक़दीर तय होने की रात मानी जाती है।
शब-ए-बारात का धार्मिक महत्व
1. तक़दीर का लिखा जाना
इस्लामी मान्यता के अनुसार, शब-ए-बारात वह रात है जब अल्लाह इंसानों की तक़दीर लिखता है। यह फैसला होता है कि आने वाले साल में किसी को कितनी रोज़ी मिलेगी, कौन से हालात से गुजरना होगा, कौन जिंदा रहेगा और कौन इस दुनिया से रुखसत होगा।
2. गुनाहों की माफी और रहमत की बारिश
हदीस शरीफ में आता है कि इस रात अल्लाह (सुब्हानु वा तआला) अपनी रहमत के साथ आसमान से पुकारते हैं:
"क्या कोई मुझसे माफी मांगने वाला है, कि मैं उसे माफ कर दूं? क्या कोई रोज़ी मांगने वाला है, कि मैं उसे अता कर दूं? क्या कोई मुसीबत में पड़ा हुआ है, कि मैं उसे राहत पहुंचाऊं?" (इब्न माजा)
इस हदीस से स्पष्ट होता है कि यह रात तौबा, इबादत और अल्लाह की रहमत को हासिल करने का सबसे बेहतरीन मौका होती है।
3. पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) की इबादत
हज़रत आयशा (रज़ि.) फरमाती हैं कि एक रात उन्होंने पैगंबर मुहम्मद (ﷺ) को अपने पास न पाकर उनकी तलाश की। वे उन्हें जन्नतुल बक़ी कब्रिस्तान में इबादत करते हुए मिलीं। पैगंबर (ﷺ) ने फरमाया:
"शाबान की मध्य रात्रि में, अल्लाह अपनी रचनाओं को देखता है और अपनी तमाम मखलूक को माफ कर देता है, सिवाय उन लोगों के जो शिर्क करते हैं या दिलों में दुश्मनी रखते हैं।" (इब्न माजा)
इससे यह पता चलता है कि इस रात इबादत करने और दूसरों को माफ करने का कितना अधिक महत्व है।
शब-ए-बारात की रात किए जाने वाले खास आमाल
1. पूरी रात इबादत में गुजारना
शब-ए-बारात की रात नफ्ल नमाज़ अदा करना, कुरान की तिलावत करना और अल्लाह से दुआ करना बहुत फज़ीलत वाला माना जाता है।
2. गुनाहों से तौबा करना
इस रात सच्चे दिल से अपने गुनाहों की माफी मांगनी चाहिए और नेक राह पर चलने का इरादा करना चाहिए।
3. कब्रिस्तान जाना और मरहूमों के लिए दुआ करना
शब-ए-बारात की रात लोग अपने मृत परिजनों की कब्रों पर जाकर उनकी मगफिरत के लिए दुआ करते हैं।
4. सदका और खैरात करना
इस रात गरीबों की मदद करना, खाने-पीने की चीजें बांटना और जरूरतमंदों की सहायता करना बहुत सवाब (पुण्य) का काम माना जाता है।
5. रोज़ा रखना
पैगंबर (ﷺ) शाबान के महीने में अधिकतर रोज़े रखते थे और इस रात के बाद के दिन का रोज़ा रखना मुस्तहब (पसंदीदा) अमल है।
शब-ए-बारात की रौनक और परंपराएँ
1. मस्जिदों और घरों में विशेष सजावट
शब-ए-बारात के मौके पर मस्जिदों और घरों में रोशनी की जाती है। कई जगहों पर सामूहिक रूप से नमाज़, जलसे और दुआओं का आयोजन किया जाता है।
2. मिठाइयाँ और पकवान बनाना
दक्षिण एशियाई देशों, खासकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस रात विशेष पकवान बनाए जाते हैं। मालवा-निमाड़ क्षेत्र में फातेहा (विशेष दुआ) के साथ मिठाइयाँ बांटी जाती हैं।
3. धार्मिक जलसे और प्रवचन
मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में इस रात विशेष जलसों का आयोजन किया जाता है, जिसमें उलेमा इस रात की फज़ीलत के बारे में तकरीरें (प्रवचन) देते हैं।
क्या बचना चाहिए?
1. दिखावे और फिजूलखर्ची से बचें
इस रात को शोहरत या धूमधाम से मनाने के बजाय, इबादत और तौबा पर ध्यान देना चाहिए। आतिशबाजी, तेज़ आवाज़ में नाते-कलाम बजाना और अन्य दिखावटी चीजें इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ हैं।
2. बिदअत (नवाचार) से बचें
इस्लाम में खुद बनाई गई नई रस्मों से बचने की हिदायत दी गई है। सिर्फ हदीस और सुन्नत के अनुसार ही इस रात को मनाना चाहिए।
3. दिलों की सफाई करें
पैगंबर (ﷺ) ने फरमाया कि इस रात अल्लाह सबको माफ कर देता है सिवाय उन लोगों के जो दूसरों से नफरत और दुश्मनी रखते हैं। इसलिए इस रात हमें अपने दिलों को साफ करना चाहिए और सभी को माफ कर देना चाहिए।
हमारी नजर: शब-ए-बारात-तौबा और रहमत की रात
शब-ए-बारात एक मुबारक रात है, जिसमें अल्लाह की रहमत, मगफिरत और बरकत बरसती है। यह हमें अपने गुनाहों से तौबा करने, नेक आमाल करने और अपनी तक़दीर की बेहतरी के लिए दुआ करने का सुनहरा अवसर देती है।
हमें चाहिए कि इस रात को पूरी श्रद्धा और संजीदगी से इबादत में बिताएं, अपने अच्छे और बुरे कर्मों पर गौर करें और आने वाले समय के लिए सही दिशा में चलने का इरादा करें।
दुआ है कि यह मुबारक रात हम सभी के लिए रहमत, बरकत और मगफिरत का जरिया बने। आमीन!
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