चिलमन: महिलाओं की आवाज़ और सशक्तिकरण का मंच – डॉ. नुसरत मेहदी
अहिल्याबाई त्रिशताब्दी पर ‘चिलमन’ मुशायरे से सजी महिला शायरों की महफ़िल
भोपाल|✍️नौशाद कुरैशी
मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग द्वारा देवी अहिल्याबाई होल्कर त्रिशताब्दी समारोह के अवसर पर विशेष व्याख्यान एवं महिला मुशायरा ‘चिलमन’ का आयोजन सोमवार दोपहर 2:00 बजे दुष्यंत संग्रहालय, शिवाजी नगर, भोपाल में किया गया। यह आयोजन महिला सशक्तिकरण को समर्पित था, जिसमें देशभर से आईं महिला शायरों ने अपने बेहतरीन कलाम पेश किए।
उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी का वक्तव्य
कार्यक्रम की शुरुआत उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने ‘देवी अहिल्याबाई होल्कर: नेतृत्व एवं बुद्धिमत्ता की प्रतीक’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा—
"अहिल्याबाई केवल एक शासक नहीं, बल्कि न्याय, लोकसेवा और महिला सशक्तिकरण की मिसाल थीं। उनका जीवन संघर्ष और समाज सेवा की प्रेरणा देता है। उर्दू अकादमी का ‘चिलमन’ कार्यक्रम भी इसी उद्देश्य को पूरा करता है, जहां महिलाओं को अपनी बात रखने, सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने और अपनी पहचान बनाने का अवसर मिलता है।"
मुशायरे की अध्यक्षता एवं विशेष सम्मान
महिला मुशायरे की अध्यक्षता वरिष्ठ शायरा अर्चना अंजुम (इंदौर) ने की, जबकि संचालन की जिम्मेदारी डॉ. अंबर आबिद (भोपाल) ने निभाई। इस अवसर पर समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ. मनेन्द्र कटियार (भोपाल) को विशेष रूप से सम्मानित किया गया।
शायरात के कलाम
मुशायरे में देशभर से आईं शायरात ने अपने प्रभावशाली अशआर पेश किए, जिनमें समकालीन समाज, स्त्री अधिकार, प्रेम और संघर्ष के रंग झलकते रहे। कुछ प्रमुख शायरात और उनके शेर इस प्रकार हैं—
अर्चना अंजुम (इंदौर)
आए हैं ज़माने में इज़्ज़त की लगन लेकर,
ख़ामोश न बैठेंगे ज़ख़्मों के बदन लेकर।
अलीना इशरत (नोएडा)
जितने तूफ़ान उठाओगे मैं सह सकती हूँ,
तेज़ आँधी में लचकने की अदा है मुझमें।
मुमताज़ नसीम (दिल्ली)
कर तो लूँ एतराफ़े-मोहब्बत, तुम फ़साना बना तो ना दोगे,
मैं तुम्हें ख़त तो लिख दूँ, मगर तुम दोस्तों को दिखा तो ना दोगे!
डॉ. अंबर आबिद (भोपाल)
मिरे सर पर रहे, आँचल, तिरी बिंदी सलामत हो,
इधर उर्दू फले-फूले, उधर हिन्दी सलामत हो।
राना ज़ेबा (ग्वालियर)
आज फिर उनके आने की आई खबर,
आज फिर दिन निकल आएगा रात में।
नम्रता श्रीवास्तव (भोपाल)
ये अदब की महफ़िलें, ये रतजगे,
तुमसे मिलने का बहाना हो गया।
निकहत अमरोहवी (अमरोहा)
ज़ुल्म और सब्र साथ करते हो,
दिन में किस तरह रात करते हो?
डॉ. मनेन्द्र कटियार (भोपाल)
हिंदू शोणित से बंग धरा को,
रंजित करते लाज नहीं आती।
तबस्सुम अश्क (उज्जैन)
मत गुमां करो ख़ुद पर, क्या रखा है इंसां में,
जिस्म ऐसे मिटता है, हड्डियां नहीं मिलतीं।
कार्यक्रम का समापन एवं आभार
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नुसरत मेहदी ने सभी अतिथियों, शायरात और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ‘चिलमन’ जैसे मंच महिलाओं को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को निखारने और समाज में अपनी आवाज़ बुलंद करने का अवसर प्रदान करते हैं।
इस तरह, यह आयोजन साहित्य और महिला सशक्तिकरण का एक प्रभावी संगम साबित हुआ, जिसने उपस्थित श्रोताओं को स्त्री चेतना और उर्दू अदब के अनूठे संगम से परिचित कराया।
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