हास्य-व्यंग्य के सरताज बेतकल्लुफ़ शाजापुरी को श्रद्धांजलि
- मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के "सिलसिला" में सजी स्मृतियों और शायरी की महफ़िल
✍️सप्तग्रह रिपोर्टर
भोपाल / शाजापुर। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में ज़िला अदब गोशा शाजापुर द्वारा "सिलसिला" कार्यक्रम के तहत प्रसिद्ध शायर बेतकल्लुफ़ शाजापुरी को समर्पित स्मृति गाथा एवं रचना पाठ का आयोजन 29 मार्च 2025 को पी. एम. कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस, ए. बी. रोड, शाजापुर में ज़िला समन्वयक अमन जादौन के सहयोग से किया गया।
कार्यक्रम में उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने "सिलसिला" के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पहल का उद्देश्य शाजापुर के शायरों और साहित्यकारों को मंच प्रदान करना है। उन्होंने कहा कि बेतकल्लुफ़ शाजापुरी ने हास्य-व्यंग्य शायरी के क्षेत्र में मध्यप्रदेश का नाम देश-विदेश तक पहुँचाया था, और उनकी अनुपस्थिति में यह विधा प्रदेश में लगभग शून्य हो गई है।
बेतकल्लुफ़ शाजापुरी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर ने की, जबकि साहित्यकार चिंटू आग़ा ने बेतकल्लुफ़ शाजापुरी के जीवन और साहित्यिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बेतकल्लुफ़ शाजपुरी का असली नाम रियाज़ आग़ा था, लेकिन साहित्यिक जगत में वे अपने उपनाम से मशहूर हुए। कम उम्र में ही शायरी से जुड़ाव होने के कारण उन्होंने इस विधा में विशेष स्थान बनाया और शिक्षक के रूप में भी सेवाएँ दीं। उनकी हास्य-व्यंग्य शायरी सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करने का सशक्त माध्यम थी।
शायरों ने किया रचना पाठ
कार्यक्रम के दौरान शाजापुर एवं आसपास के कई शायरों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। इनमें प्रमुख शायरों द्वारा प्रस्तुत कुछ अशआर इस प्रकार हैं:
- राज़ रूमानी
तल्ख़ लहज़े को ज़रा मुरझाइये।"
- पंकज पलाश
"ऐसे शामिल हैं हम कहानी में,
जैसे मछली के अश्क पानी में।"
- हनीफ़ राही
"अम्न का क़ाफ़िला करता रहा मिन्नत फिर भी,
चंद लम्हों को भी ख़ामोश न बैठे हम लोग।"
- शुभम शर्मा
"तेरी आँखें, तेरे आँसू, तेरा ग़म,
न जाने क्यों फिर भी भीग रहे हैं हम।"
- मशहूर शाजपुरी
"ख़ुदा बीवियों को तू शोहर का डर दे,
मर्दों के दामन को ख़ुशियों से भर दे।"
- अर्पित शर्मा
"डर है लपक न लें मुझे मेरी उदासियाँ,
तुम मुस्कुरा के मुझ में उजाला किया करो।"
- आयुष आदर्श
"हमारे साथ रहती है तुम्हारे प्यार की खुशबू,
हमें अब तक लुभाता है तुम्हारे प्यार का जादू।"
- कविता पुणतांबेकर
"उजाला हमें आज भाया न था,
यहाँ राहतों का जो साया न था।"
- अमन जादौन
"मुफ़लिस के आँसुओं की दुआ जब हुई क़ुबूल,
आँधी ने तिनके जोड़ के छप्पर बना दिया।"
कार्यक्रम का संचालन अमन जादौन ने किया और अंत में उन्होंने सभी अतिथियों, रचनाकारों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।
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