भोपाल सेंट्रल जेल में इंसानियत और हमदर्दी की अनूठी मिसाल

  • ख़ुद्दाम-ए-मिल्लत कमेटी की ऐतिहासिक इफ्तार, क़ैदियों की आँखें छलक उठीं

✍️सप्तग्रह रिपोर्टर


भोपाल। 
रोज़े की इबादत, दुआओं की गूंज और इंसानियत की महक से सराबोर एक अनूठा नज़ारा भोपाल सेंट्रल जेल में देखने को मिला, जब ख़ुद्दाम-ए-मिल्लत कमेटी ने एक ऐतिहासिक इफ्तार का एहतिमाम किया। पिछले 15 सालों से लगातार इस नेक सरगर्मी को जारी रखते हुए, इस बार भी क़ैदियों के लिए सिर्फ़ रोज़ा इफ्तार का इंतज़ाम ही नहीं हुआ, बल्कि उनके दिलों पर दस्तक देने वाला एक जज़्बाती मंज़र भी देखने को मिला।

इफ्तार की घड़ी और छलकते जज़्बात

जेल की सलाखों के पीछे रहने वाले सैंकड़ों क़ैदियों ने जब एक साथ रोज़ा खोला, तो वहां मौजूद हर शख़्स के दिल में इंसानियत और भाईचारे का जज़्बा उमड़ पड़ा। यह कोई आम दावत नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए एक नई रोशनी थी, जिनकी ज़िंदगी अंधेरों में घिरी हुई है।


नमाज़-ए-मग़रिब के बाद जब क़ारी सैयद शाहवेज़ परवेज़ हुसैनी नदवी ने ख़ास दुआ कराई, तो माहौल पूरी तरह जज़्बाती हो गया। जैसे ही दुआ में क़ैदियों की इस्लाह, उनकी रिहाई, उनके घर-परिवार की भलाई और सब्र की दुआएं मांगी गईं, तो न जाने कितनी आँखें छलक पड़ीं। कुछ क़ैदियों ने अपने आँसू पोंछते हुए हाथ दुआ में उठा दिए, तो कुछ ने ग़म और उम्मीद के मिले-जुले एहसास के साथ अपने चेहरों को छुपा लिया।

इंसानियत का पैग़ाम और जेल में नई रोशनी

इस इफ्तार का सिर्फ़ एक मक़सद था – इंसानियत, हमदर्दी और नई राह दिखाने का जज़्बा। ख़ुद्दाम-ए-मिल्लत कमेटी के सरपरस्त सैयद परवेज़ खलील साहब ने जेल प्रशासन का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि यह केवल एक इफ्तार नहीं, बल्कि उन लोगों तक उम्मीद और रहमत का पैग़ाम पहुँचाने की एक कोशिश है, जिनकी ज़िंदगी का हर दिन पछतावे और इंतज़ार में गुजरता है।


जेल में इफ्तार: एक फलाही और रूहानी पहल

इस ऐतिहासिक मौके पर मस्जिद अब्दुल अज़ीम के सदर सलमान ख़ान, फ़ारूक़ माज़, हाफ़िज़ उमर अली, मुहम्मद फ़ारूक़ समेत कई समाजसेवी भी शरीक हुए। सभी ने इस कोशिश की सराहना की और उम्मीद जताई कि ऐसे इस्लाही और रूहानी प्रोग्राम आगे भी जारी रहेंगे।

ख़ुद्दाम-ए-मिल्लत कमेटी के संयोजक मुफ़्ती सैयद दानिश परवेज़ नदवी और प्रवक्ता क़ारी सैयद शाहवेज़ परवेज़ हुसैनी नदवी ने कहा कि उनका मक़सद केवल इफ्तार तक सीमित नहीं, बल्कि क़ैदियों के दिलों में एक नई उम्मीद और ज़िंदगी को बेहतर बनाने की चाहत जागाना है।


एक नई सुबह की दुआ

इफ्तार के बाद जेल के कई क़ैदियों ने अपने जज़्बात ज़ाहिर किए। कुछ ने कहा कि उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि सलाखों के बाहर भी कोई उनकी परवाह करता है। कुछ की आवाज़ भर्राई, जब उन्होंने अपने घरवालों के लिए दुआ मांगी।

यह इफ्तार एक यादगार लम्हा बन गया – एक उम्मीद, एक दुआ, और एक नई सुबह की उम्मीद। ख़ुद्दाम-ए-मिल्लत कमेटी की यह पहल उन दिलों को छू गई, जो ज़िंदगी के अंधेरों में एक रोशनी तलाश रहे थे।



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